न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||
बरसों की तनहाई, जाने किसका साज लेकर चली आती हैं ||
यूं तो याद नहीं हमें, गुजरे हुए वाकयात, और लम्हे
जाने कहाँ-कहाँ से ये जानी-पहचानी पुकार चली आती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||
मंजर और समंदर, दोनों ही बदलते रहते हैं अवस्थाएं
क्यों हर मोड मुड़कर, एक पहचानी सी डगर चली आती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||
ये हैं कौन, जो सदियों से पुकारे जाता हैं मुझ को बार-बार
और एक मेरी हस्ती हैं, इच्छाओं की भरमार में कैद हुई जाती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||
और एक मेरी नींद हैं, की माया की रजाई में लपेट जाती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||
ये कौन हैं जो खींचता हैं दूर, प्रपंच के भूलभुलैया से कभी-कभार
और एक चिंता हैं भविष्य की, की भूलभुलैया में फंसा लेती हैं बरकरार ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||
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