रविवार, 25 दिसंबर 2016

मेरा नया घर - Mera naya ghar

खुली आँखों से आज तुम्हे ख्वाब में देखा, और मेरे नए घर बुलाना चाहा
एक मंजर, एक जमाना, अब कोई भी पीछे नहीं खींच रहा|

अब नहीं रहती उन गलियों में, जहाँ पहले रहती थी
अब नहीं जलती उन ज्वालाओं में, जिनमे पहले भुन जाती थी
ख़ुशी हैं मुझे, खुद के साथ, अब कोई कडवा किनारा न रहा |

पीछे छोड़ आई हूँ वो जाल-जंजाल, तेरे इंतजार के पल और तेरे माल-मलाल
अब जीवन लगता हैं सफल, अभी यहाँ हैं आर पार, बिना तकरार
पाया हैं उसे हमेशा से, उस, मेरे मुर्शिद से दूरी का बहाना न रहा |

तूने भी तो अब अपनी राह पा ली होगी, खानाबदोश आसमान की तरह
कभी बुलाया था मैंने तुझे, अजीज मेहमान की तरह
बिखरी हवाओं की तरह, तेरी खबर, तेरा ठिकाना न रहा

तूने भी तो पाया होगा मुर्शिद को, इच्छाओं के रस्ते से हटकर
तूने भी तो जगाया होगा रातो को, कभी कासानोवा, कभी बुद्ध बनकर
तेरी डगर का मेरे आसमान में, कहीं भी कोई सुराग न रहा

खुली आँखों से आज तुम्हे ख्वाब में देखा, और मेरे नए घर बुलाना चाहा
एक मंजर, एक जमाना, अब कोई भी पीछे नहीं खिंच रहा|

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

Ek Pal Ka Milna


Dedicated to my master - The guru - the only beloved who does not belong to THE MIND...body or thoughts...

एक पल का मिलना काफी नहीं हैं
जीवन की लम्बी यात्रा के लिए
यू आना और एक नजर देख जाना
काफी नहीं मुझ मुरीद के लिए



जाना ही हैं अगर तुमको,
तो ले जाओ मुझको
पात्रता नहीं मेरी
इस संसार में जीने के लीये



केवल स्मरण से मरण नहीं आता
ध्यान जरुरी हैं असली मरण के लिए
तुम मुर्शिद मेरे, मौला मेरे
मेरा मरना तुमको पाने के लिए



तुमने वादा किया था साथ चलने का
झेनगिरी कर कर के मुझको रुलाने का
बताओ तो जरा – क्या काफी हैं
हर दिन की तकलीफे
बिन तुम्हारे – तुम्हारे पार जाने के लिए?



एक पल काफी नहीं हैं
एक बार में तुमको जानने के लिए
फिर फिर से चले आओ
मेरी सादगी को आजमाने के लिए


रविवार, 13 मार्च 2016

Najar

एक नजर के इन्तजार में, और नज़रें परेशान होती हैं,
एक नजर के जवाब में, दूसरी नज़र ग़ज़ल बन जाती हैं,
नजर-नजर के खेल में, यूँ जवानी बीती जाती हैं,
नयी दिशाओं में, नए आसमान की कहानी लिखी जाती हैं,
नजर से नजर तक, होती हैं हसीं गुफ्तगू
और एक दूजे को मिल जाता हैं मदमस्त नजराना
नजर-नजर के खेल में, फिर हो जाता हैं अंदाज शायराना
फिर न बंदिश जवानी की, न मंदिर, न मैखाना
इस दुनिया से दूसरी दुनिया में, हो जाते हैं रवाना
नजर-नजर के खेल में, फिर मौसम लगे मस्ताना ||

रविवार, 6 मार्च 2016

Na jane Kaun pukarta hain


न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||
बरसों की तनहाई, जाने किसका साज लेकर चली आती हैं ||


यूं तो याद नहीं हमें, गुजरे हुए वाकयात, और लम्हे
जाने कहाँ-कहाँ से ये जानी-पहचानी पुकार चली आती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||


मंजर और समंदर, दोनों ही बदलते रहते हैं अवस्थाएं
क्यों हर मोड मुड़कर, एक पहचानी सी डगर चली आती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||


ये हैं कौन, जो सदियों से पुकारे जाता हैं मुझ को बार-बार
और एक मेरी हस्ती हैं, इच्छाओं की भरमार में कैद हुई जाती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||


ये कौन हैं जो जगाये जाता हैं मुझ को, अनेको संकेतों से बार बार
और एक मेरी नींद हैं, की माया की रजाई में लपेट जाती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||


ये कौन हैं जो खींचता हैं दूर, प्रपंच के भूलभुलैया से कभी-कभार
और एक चिंता हैं भविष्य की, की भूलभुलैया में फंसा लेती हैं बरकरार ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||