As an ardent fan of Amrita Pritam, I wrote this for her - on 7-Sept-2014
ऐ री अमृता!!
तेरा अक्षरनामा सज-धज के आता हैं, किताबों से उठकर |
बरसता हैं आंखो से, तेरी सोहबत की बारिश बनकर|
तेरा अक्षरनामा सज-धज के आता हैं, किताबों से उठकर |
बरसता हैं आंखो से, तेरी सोहबत की बारिश बनकर|
ऐ री अमृता!!
क्या जानु मैं तू क्या लगती हैं मेरी, तेरे शब्दों मे खोकर|
समय की दीवारें ढह जाती हैं, तुझको-मुझको जोडकर|
ऐ री अमृता!! मुझे निखार दे अपनी बेटी बनाकर|
बाहों मे सुलाकर, बरखा मे भिगोकर, खुशियों की पेटी बनाकर|
ऐ री अमृता!!
जब जब तुझ से मिलती हूँ, पाठक/वाचक बनकर|
तू समा लेती हैं मुझको अपने आसमान मे, खुद का हिस्सा बनाकर|
जब जब तुझ से मिलती हूँ, पाठक/वाचक बनकर|
तू समा लेती हैं मुझको अपने आसमान मे, खुद का हिस्सा बनाकर|
ऐ री अमृता !
तेरे अल्फाज़ महज अल्फ़ाज़ नहीं, कायनात हैं |
दिलों को पिघलाकर स्नेहसागर मे गिराना, ये तेरी ही करामात हैं|
तेरे अल्फाज़ महज अल्फ़ाज़ नहीं, कायनात हैं |
दिलों को पिघलाकर स्नेहसागर मे गिराना, ये तेरी ही करामात हैं|
तुम्हारे डॉक्टर देव के सजदे मे, मैं ममता बन गयी|
हद तो तब हो गयी
रसीदी टिकिट पढ़ते पढ़ते, मैं अचानक अमृता अमृता हो गयी|
आंखो से तुम बहने लगी और मेरी अभिव्यक्ति खो गयी|
आंखो मे पानी बनकर ये नामा तुम्हारे लिए लिख रही हूँ|
पानी भी तुम, नामा भी तुम, तुमको ही प्रेम की अभिव्यक्ति बनाकर|
पानी भी तुम, नामा भी तुम, तुमको ही प्रेम की अभिव्यक्ति बनाकर|
ऐ री अमृता!!
ऐ री अमृता!!
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