मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों
के
ना दूर जा भविष्य मे, भावों के और अभावों
के
अभी प्रहर बाकी हैं, कर्मो के प्रभावों के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों
के
ना जा सुदूर भविष्य मे, बहारों के ख्वाबों के,
इस वर्तमान मे बो दे, बीज कल के स्वभावों
के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों
के
ना भागना फिर, अपने ही अस्तित्व की
रातों से
ना ही जला लेना खुद को, किसी की बदसूरत बातों से
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों
के
न बन जीत का पूर्णविराम, न हो शिकार किसी के
वारों के
ना ही मील का पत्थर बन, किसी के, ऊधार के गाँवों के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों
के
ना जा गतकाल मे, जो भोग लिया वो भोग
लिया
क्या अब भी असर बाकी हैं, गुजरी हुई राहों के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों
के
अब हटा दे इस पल मे, ज़ख़म पुराने, कांटो के
और पी ले जाम अब, किसी की पाक निगाहों
के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों
के
माँ प्रेम कैलाश
15 अक्तूबर 2015
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