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शुक्रवार, 25 मार्च 2016

Ek Pal Ka Milna


Dedicated to my master - The guru - the only beloved who does not belong to THE MIND...body or thoughts...

एक पल का मिलना काफी नहीं हैं
जीवन की लम्बी यात्रा के लिए
यू आना और एक नजर देख जाना
काफी नहीं मुझ मुरीद के लिए



जाना ही हैं अगर तुमको,
तो ले जाओ मुझको
पात्रता नहीं मेरी
इस संसार में जीने के लीये



केवल स्मरण से मरण नहीं आता
ध्यान जरुरी हैं असली मरण के लिए
तुम मुर्शिद मेरे, मौला मेरे
मेरा मरना तुमको पाने के लिए



तुमने वादा किया था साथ चलने का
झेनगिरी कर कर के मुझको रुलाने का
बताओ तो जरा – क्या काफी हैं
हर दिन की तकलीफे
बिन तुम्हारे – तुम्हारे पार जाने के लिए?



एक पल काफी नहीं हैं
एक बार में तुमको जानने के लिए
फिर फिर से चले आओ
मेरी सादगी को आजमाने के लिए


शुक्रवार, 19 जून 2015

Anaahat

अपने पहले-पहल ब्लॉग पर पेश कर रही हूँ, मेरी एक कविता। उम्मीद करती हूँ की रसिकों को पसंद आए। इसे मैंने लिखा था 18 जनवरी 2015 को।


अनाहत :)


अपनी ही धुन मे, जाने कब से, यूं ही बही जाती हूँ
पल-पल की चादर पर, अथक अनाहत चलती जाती हूँ
कभी इच्छाओं के होसले, बना लेते हैं राह पर घोसले
एक ही पल मे हजारो, आलिशान महलों से गुजर जाती हूँ

कभी ख्वाबो को बिखरे देखकर, मैं समेटती जाती हूँ
इधर-उधर गिरे हुए, खुद ही के अनगिनत टुकड़ो को
अपने हृदय की ज्वाला मे, समिधा बनाकर समाये जाती हूँ
साँसो के यज्ञ मे, खुद ही का अर्पण किए जाती हूँ

फिर लौट आती हूँ, इस पल की कायनात मे
फिर खुद ही को साँसो पर, पहरे के लिए बैठा देती हूँ
की एक एक सांस आए तो अनंत बन के आए
और जाये तो अनादी हो कर आसमान  मे फ़ेल जाए
फिर इस आसमान मे देखती जाती हूँ
खुद ही के अहसासों को फिर फिर से जिये जाती हूँ
प्यासी हो कर ओशो को पियक्कड़ की तरह पिये जाती हूँ