शुक्रवार, 19 जून 2015

Anaahat

अपने पहले-पहल ब्लॉग पर पेश कर रही हूँ, मेरी एक कविता। उम्मीद करती हूँ की रसिकों को पसंद आए। इसे मैंने लिखा था 18 जनवरी 2015 को।


अनाहत :)


अपनी ही धुन मे, जाने कब से, यूं ही बही जाती हूँ
पल-पल की चादर पर, अथक अनाहत चलती जाती हूँ
कभी इच्छाओं के होसले, बना लेते हैं राह पर घोसले
एक ही पल मे हजारो, आलिशान महलों से गुजर जाती हूँ

कभी ख्वाबो को बिखरे देखकर, मैं समेटती जाती हूँ
इधर-उधर गिरे हुए, खुद ही के अनगिनत टुकड़ो को
अपने हृदय की ज्वाला मे, समिधा बनाकर समाये जाती हूँ
साँसो के यज्ञ मे, खुद ही का अर्पण किए जाती हूँ

फिर लौट आती हूँ, इस पल की कायनात मे
फिर खुद ही को साँसो पर, पहरे के लिए बैठा देती हूँ
की एक एक सांस आए तो अनंत बन के आए
और जाये तो अनादी हो कर आसमान  मे फ़ेल जाए
फिर इस आसमान मे देखती जाती हूँ
खुद ही के अहसासों को फिर फिर से जिये जाती हूँ
प्यासी हो कर ओशो को पियक्कड़ की तरह पिये जाती हूँ


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें