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मंगलवार, 10 जनवरी 2017

Miniature Life


हर शाम मैं बूढी हो जाती हूँ
और शांत भाव से रात में विलीन हो जाती हूँ

हर सुबह फिर एक नया जीवन आता हैं
अपना ही ‘miniature life’ देखकर

मैं और एक बार अपनी पूर्णता में जी लेती हूँ |

सुबह की किरणे, जैसे मेरे बचपन के पल
खिलती कलियाँ, पत्ते और फूल,
जैसे मेरे परम मित्र, निष्पाप, सरल
फिर मैं जवान होती हूँ सूरज के साथ
जोश में काम कर लेती हूँ, सरे आम कर लेती हूँ
दुनिया को हिला के रख देने का हौसला रखती हूँ |


बनाती हूँ रिश्ते अलग अलग जाने-पहचाने
कुछ पिछले जन्मों के करम
कुछ इस जनम के याराने
फिर फंसती हूँ दिन के जंजाल में
ह्रदय और विचार के भंवर में
फिर रस्ते चुनने पड़ते हैं
इस तरह जीवन को मैं जीती जाती हूँ
जीवन की चुनौतियों में हल-मिल जाती हूँ
अभी और यहाँ में बहती चली जाती हूँ |


भूतकाल के पाश
कब किस ध्यानी को पकड़ पाये
कर्मों के परिणाम
कब किस प्राणी को माफ़ हुए?
इसलिये तो, गुरु के रस्ते मैं चलती जाती हूँ
भरोसे की गठरी, और intuition का सहारा लेकर
खुद को और तराशती जाती हूँ |


फिर चुक जाता हैं तेल मेरे दिये का
सूरज जब सर पर आता हैं
अपने सर पर हाथ रख देती हूँ
फिर धीरे धीरे ढलान शुरू हो जाती हैं
जीवन की बाती दुबली होके जलती हैं
अब मैं सारा ध्यान खुद पर देती हूँ
खुद ही से खुद का हिसाब शुरू करती हूँ
किसी का मुझ पर उधार तो नहीं
किसी को लेकर मेरे मन में बवाल तो नहीं
यूँ फिर, मैं शाम तक “कुछ कही, कुछ अनकही“
अपनी पात्रता में खिली हुई संतुष्ट आत्मा बन जाती हूँ |


इस तरह, हर शाम मैं बूढी हो जाती हूँ
और शांत भाव से रात में विलीन हो जाती हूँ
9-Jan-2017

रविवार, 25 दिसंबर 2016

मेरा नया घर - Mera naya ghar

खुली आँखों से आज तुम्हे ख्वाब में देखा, और मेरे नए घर बुलाना चाहा
एक मंजर, एक जमाना, अब कोई भी पीछे नहीं खींच रहा|

अब नहीं रहती उन गलियों में, जहाँ पहले रहती थी
अब नहीं जलती उन ज्वालाओं में, जिनमे पहले भुन जाती थी
ख़ुशी हैं मुझे, खुद के साथ, अब कोई कडवा किनारा न रहा |

पीछे छोड़ आई हूँ वो जाल-जंजाल, तेरे इंतजार के पल और तेरे माल-मलाल
अब जीवन लगता हैं सफल, अभी यहाँ हैं आर पार, बिना तकरार
पाया हैं उसे हमेशा से, उस, मेरे मुर्शिद से दूरी का बहाना न रहा |

तूने भी तो अब अपनी राह पा ली होगी, खानाबदोश आसमान की तरह
कभी बुलाया था मैंने तुझे, अजीज मेहमान की तरह
बिखरी हवाओं की तरह, तेरी खबर, तेरा ठिकाना न रहा

तूने भी तो पाया होगा मुर्शिद को, इच्छाओं के रस्ते से हटकर
तूने भी तो जगाया होगा रातो को, कभी कासानोवा, कभी बुद्ध बनकर
तेरी डगर का मेरे आसमान में, कहीं भी कोई सुराग न रहा

खुली आँखों से आज तुम्हे ख्वाब में देखा, और मेरे नए घर बुलाना चाहा
एक मंजर, एक जमाना, अब कोई भी पीछे नहीं खिंच रहा|

रविवार, 13 मार्च 2016

Najar

एक नजर के इन्तजार में, और नज़रें परेशान होती हैं,
एक नजर के जवाब में, दूसरी नज़र ग़ज़ल बन जाती हैं,
नजर-नजर के खेल में, यूँ जवानी बीती जाती हैं,
नयी दिशाओं में, नए आसमान की कहानी लिखी जाती हैं,
नजर से नजर तक, होती हैं हसीं गुफ्तगू
और एक दूजे को मिल जाता हैं मदमस्त नजराना
नजर-नजर के खेल में, फिर हो जाता हैं अंदाज शायराना
फिर न बंदिश जवानी की, न मंदिर, न मैखाना
इस दुनिया से दूसरी दुनिया में, हो जाते हैं रवाना
नजर-नजर के खेल में, फिर मौसम लगे मस्ताना ||

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

करती हूँ - Yes I do... :)


तन की शहनाई, मन की गहराई

अब में तुझको समर्पित करती हूँ

तेरी ही प्रतीक्षा में, तेरे मिलन तक

अब अपनी पात्रता अर्जित करती हूँ



दो शब्दों के बिच की तन्हाई

अब में तझको अर्पित करती हूँ

तेरे साथ जो हुई आँखमिचौनी

अब में उसको चर्चित करती हूँ



कहते होंगे तुझको ‘आलसी’

या फिर ‘स्लो’ तेरे घरवाले

लेकिन, ‘Thoughtful Work-In-Progress’

आज में तुझको घोषित करती हूँ



कितना दूर तू, कितना पास तू

अनचली पगडंडी का प्रमाण तू

तेरे ही साथ के सपनो में

अब में पुण्य संचित करती हूँ



मन भावन तू, घना सावन तू

तुझ ही में सिमटने की

अब में गुजारिश करती हूँ


( Written earlier - sharing now )

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

Parvati

पार्वती की यात्रा, अभी पूरी कहाँ हुई?
होश के औषधि की मात्रा, अभी पूरी कहाँ हुई?

ना स्वपन दिखा, किसी शिव-शंकर के
उसके सहवास की पात्रता, अभी पूरी कहाँ हुई?

पहचान ना पाऊँगी उनको, न ही झेल पाऊँगी
मेरी मनीषाओं की, अभी भभूति कहाँ हुई?

ना जला अगन मे, न भटका अवगुण मे
मेरी बरसो पुरानी बेहोशी, अभी भंग कहाँ हुई?

तन के रोग अभी हटे नहीं, मन के रोग अभी छंटे नहीं
गुजरी इतनी राहें मगर, अभी मैं योगी कहाँ हुई?

अभी चालित हूँ, विचलित हूँ, यंत्र संचालित हूँ,
कहाँ प्रेम हैं, और कहाँ शिव, अभी मैं कैलाश कहाँ हुई?

पार्वती की यात्रा, अभी पूरी कहाँ हुई?
होश के औषधि की मात्रा, अभी पूरी कहाँ हुई?


माँ प्रेम कैलाश
13 अक्तूबर 2015

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

Adbhut hain ye prem bhi

अदभुत है ये प्रेम भी 

अद्भुत है
ये प्रेम भी - मनुष्य को भिखारी बना देता है
अद्भुत है ये प्रेम भी - प्रियतम को भगवान बना देता है
कभी Einstine, तो कभी शिव जी बना देता है

अद्भुत है ये प्रेम भी – इंसान को झुका देता है
छोटी छोटी हरकतों को खिलने का मौका देता है

अद्भुत है ये प्रेम भी – प्यासे को सावन बना देता है
कभी सावन को प्यासा बनाकर बारिश का दिलासा देता है

अद्भुत है ये प्रेम भी – कभी उमंगो को फुहारे लाता है
कभी मुझे उनमे बहा देता है, कभी उनकी यादो में गुदगुदाता है

अद्भुत है ये प्रेम भी – कभी उनको थिर हिमालय बना देता है
कभी चंचल हिरनी की तरह, मुझको थिरकता मौसम बना देता है

अद्भुत है ये प्रेम भी – वाकई



अभिव्यक्ति 28 मार्च 2013