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मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

करती हूँ - Yes I do... :)


तन की शहनाई, मन की गहराई

अब में तुझको समर्पित करती हूँ

तेरी ही प्रतीक्षा में, तेरे मिलन तक

अब अपनी पात्रता अर्जित करती हूँ



दो शब्दों के बिच की तन्हाई

अब में तझको अर्पित करती हूँ

तेरे साथ जो हुई आँखमिचौनी

अब में उसको चर्चित करती हूँ



कहते होंगे तुझको आलसी

या फिर स्लो तेरे घरवाले

लेकिन, Thoughtful Work-In-Progress

आज में तुझको घोषित करती हूँ



कितना दूर तू, कितना पास तू

अनचली पगडंडी का प्रमाण तू

तेरे ही साथ के सपनो में

अब में पुण्य संचित करती हूँ



मन भावन तू, घना सावन तू

तुझ ही में सिमटने की

अब में गुजारिश करती हूँ


( Written earlier - sharing now )

शनिवार, 20 जून 2015

Sapna yah sansaar

Written on 16th March 2002

सपना यह संसार, मन रे, सपना यह संसार,
बस एक जैसे है, क्या चन्दन क्या अंगार!!!

है राही सारे अपने अपने, पर मेरी है ये डगर
तेरा प्रेम रहा उस पार, सिर्फ मेरा है सफ़र!!

जाने कहा से नदिया चली, कहा पर है मंज़र
ये सारे एक जैसे, जाने कहा होश, जाने उजाला किधर!!

तेरा साथ है भी नहीं भी, मेरा होना है भी नहीं भी
मन के रास्ते कितने ऊँचे नीचे, जाने सफल है किधर!!

ये कौन है, नींदे उडाता है, होश जगाता है बार बार
मंदिर की सीढियों पर भी क्यूँ , मन सोता है बार बार!!

मन के मंजीरे खनकते है, तन की जंजीरे  खींचती है
मेरी गागर उसका सागर, जाने कौन राही, जाने कौन डगर !!