Written
on 16th March 2002
सपना यह संसार, मन रे, सपना यह संसार,
बस एक जैसे है, क्या चन्दन क्या अंगार!!!
है राही सारे अपने अपने, पर मेरी है ये डगर
तेरा प्रेम रहा उस पार, सिर्फ मेरा है सफ़र!!
जाने कहा से नदिया चली, कहा पर है मंज़र
ये सारे एक जैसे, जाने कहा होश, जाने उजाला किधर!!
तेरा साथ है भी नहीं भी, मेरा होना है भी नहीं भी
मन के रास्ते कितने ऊँचे नीचे, जाने सफल है किधर!!
ये कौन है, नींदे उडाता है, होश जगाता है बार बार
मंदिर की सीढियों पर भी क्यूँ , मन सोता है बार बार!!
मन के मंजीरे खनकते है, तन की जंजीरे खींचती है
मेरी गागर उसका सागर, जाने कौन राही, जाने कौन डगर !!
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