गुरुवार, 25 जून 2015

Main Chalati Firati Kavita Hun

मैं चलती फिरती कविता हूँ
(Written on 7th Nov 2013)
जीवन हूँ , नस नस में बहती हूँ
परमात्मा की बेटी हूँ ,
रस की पेटी हूँ,
मैं चलती फिरती कविता हूँ

 नूर की बूँद बन कर
मैं ही आँखों से टपकती हूँ
खुद की तक़दीर बन कर
मैं ही जुबा से निकलती हूँ
गौतम बुद्ध का मौन भी मैं ही
कालिदास का प्रेम भी मैं ही
मैं ही शिव की भक्ति भी
क्यों की मैं चलती फिरती कविता हूँ

बंद आँखों की गहराई हु
प्रिय से मिलन की शाहनाइ हूँ
आसुओं की तनहाई भी मैं ही
अपनी कमाई भी खुद मैं ही
मैं ही जगाती हूँ खुद को
अनाहत नाद गाकर
क्यों की मैं चलती फिरती कविता हूँ

इज्जत से प्रेम करती हूँ
रूमी (RUMI) से इजाजत पाकर
रोग-निवारण करती हूँ
अपने ही श्वास का मरहम लगाकर
मैं ही मंतर पढ़ती हु
खुद की शुद्धि के
क्यों की मैं चलती फिरती कविता हूँ

युग युग से ढूंढ रही हूँ
खुद ही के अफसाने को, फिर भी
खोया था कभी जाने कैसे,
पा लेती हूँ फिर फिर से
फिर फिर से खुद से मिल जाती हूँ
क्यों की, मैं इस अस्तित्व की अभिव्यक्ति हूँ

मैं होश की धारा हूँ
इंद्र के बगीचे का सुन्दर फव्वारा हूँ
बुड्ढो का बचपन भी मैं ही
बुद्धों की बुद्धि भी मैं ही
मैं शक्ति अनंत अपार हूँ
क्यों की मैं इस अस्तित्व की अभिव्यक्ति हूँ

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