शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

कविता के लिए जरुरी हैं - Kavita ke liye jaruri hain


कविता के लिए जरुरी हैं मेरा अकेला होना
कविता के लिए जरुरी हैं मेरा खुद में खोना,
कविता ऐसे ही किसी के पास नहीं आती,
कविता के लिए जरुरी हैं, मेरा खाली होना ||

नहीं तो ये ऐसे ही, दरवाजा ठोक कर निकल जाती हैं
दबे पावों से घंटी बजाकर, छुपकर निकल जाती हैं
इसे अच्छा नहीं लगता, मेरा औरों से घिरा हुआ होना
कविता के लिए जरुरी हैं मेरा अकेला होना ||

कभी ये बादल की तरह आती हैं, और घिरी की घिरी रह जाती हैं
बिन-बरसे ही अपने होने का अहसास दिलाती रहती है
जरुरी तो हैं, इसके प्रगटन का हुनर होना, पर
कविता के लिए जरुरी हैं मेरा अकेला होना ||

कभी ये बारिश की तरह मुसलाधार बरसती हैं
सारे बंधन तोड़कर, आसुओं की तरह बहती हैं
आती हैं ये उपरवाले का नजराना बनकर,
पर फिर भी
कविता के लिए जरुरी हैं मेरा अकेला होना ||

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

Miniature Life


हर शाम मैं बूढी हो जाती हूँ
और शांत भाव से रात में विलीन हो जाती हूँ

हर सुबह फिर एक नया जीवन आता हैं
अपना ही ‘miniature life’ देखकर

मैं और एक बार अपनी पूर्णता में जी लेती हूँ |

सुबह की किरणे, जैसे मेरे बचपन के पल
खिलती कलियाँ, पत्ते और फूल,
जैसे मेरे परम मित्र, निष्पाप, सरल
फिर मैं जवान होती हूँ सूरज के साथ
जोश में काम कर लेती हूँ, सरे आम कर लेती हूँ
दुनिया को हिला के रख देने का हौसला रखती हूँ |


बनाती हूँ रिश्ते अलग अलग जाने-पहचाने
कुछ पिछले जन्मों के करम
कुछ इस जनम के याराने
फिर फंसती हूँ दिन के जंजाल में
ह्रदय और विचार के भंवर में
फिर रस्ते चुनने पड़ते हैं
इस तरह जीवन को मैं जीती जाती हूँ
जीवन की चुनौतियों में हल-मिल जाती हूँ
अभी और यहाँ में बहती चली जाती हूँ |


भूतकाल के पाश
कब किस ध्यानी को पकड़ पाये
कर्मों के परिणाम
कब किस प्राणी को माफ़ हुए?
इसलिये तो, गुरु के रस्ते मैं चलती जाती हूँ
भरोसे की गठरी, और intuition का सहारा लेकर
खुद को और तराशती जाती हूँ |


फिर चुक जाता हैं तेल मेरे दिये का
सूरज जब सर पर आता हैं
अपने सर पर हाथ रख देती हूँ
फिर धीरे धीरे ढलान शुरू हो जाती हैं
जीवन की बाती दुबली होके जलती हैं
अब मैं सारा ध्यान खुद पर देती हूँ
खुद ही से खुद का हिसाब शुरू करती हूँ
किसी का मुझ पर उधार तो नहीं
किसी को लेकर मेरे मन में बवाल तो नहीं
यूँ फिर, मैं शाम तक “कुछ कही, कुछ अनकही“
अपनी पात्रता में खिली हुई संतुष्ट आत्मा बन जाती हूँ |


इस तरह, हर शाम मैं बूढी हो जाती हूँ
और शांत भाव से रात में विलीन हो जाती हूँ
9-Jan-2017

रविवार, 25 दिसंबर 2016

मेरा नया घर - Mera naya ghar

खुली आँखों से आज तुम्हे ख्वाब में देखा, और मेरे नए घर बुलाना चाहा
एक मंजर, एक जमाना, अब कोई भी पीछे नहीं खींच रहा|

अब नहीं रहती उन गलियों में, जहाँ पहले रहती थी
अब नहीं जलती उन ज्वालाओं में, जिनमे पहले भुन जाती थी
ख़ुशी हैं मुझे, खुद के साथ, अब कोई कडवा किनारा न रहा |

पीछे छोड़ आई हूँ वो जाल-जंजाल, तेरे इंतजार के पल और तेरे माल-मलाल
अब जीवन लगता हैं सफल, अभी यहाँ हैं आर पार, बिना तकरार
पाया हैं उसे हमेशा से, उस, मेरे मुर्शिद से दूरी का बहाना न रहा |

तूने भी तो अब अपनी राह पा ली होगी, खानाबदोश आसमान की तरह
कभी बुलाया था मैंने तुझे, अजीज मेहमान की तरह
बिखरी हवाओं की तरह, तेरी खबर, तेरा ठिकाना न रहा

तूने भी तो पाया होगा मुर्शिद को, इच्छाओं के रस्ते से हटकर
तूने भी तो जगाया होगा रातो को, कभी कासानोवा, कभी बुद्ध बनकर
तेरी डगर का मेरे आसमान में, कहीं भी कोई सुराग न रहा

खुली आँखों से आज तुम्हे ख्वाब में देखा, और मेरे नए घर बुलाना चाहा
एक मंजर, एक जमाना, अब कोई भी पीछे नहीं खिंच रहा|

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

Ek Pal Ka Milna


Dedicated to my master - The guru - the only beloved who does not belong to THE MIND...body or thoughts...

एक पल का मिलना काफी नहीं हैं
जीवन की लम्बी यात्रा के लिए
यू आना और एक नजर देख जाना
काफी नहीं मुझ मुरीद के लिए



जाना ही हैं अगर तुमको,
तो ले जाओ मुझको
पात्रता नहीं मेरी
इस संसार में जीने के लीये



केवल स्मरण से मरण नहीं आता
ध्यान जरुरी हैं असली मरण के लिए
तुम मुर्शिद मेरे, मौला मेरे
मेरा मरना तुमको पाने के लिए



तुमने वादा किया था साथ चलने का
झेनगिरी कर कर के मुझको रुलाने का
बताओ तो जरा – क्या काफी हैं
हर दिन की तकलीफे
बिन तुम्हारे – तुम्हारे पार जाने के लिए?



एक पल काफी नहीं हैं
एक बार में तुमको जानने के लिए
फिर फिर से चले आओ
मेरी सादगी को आजमाने के लिए


रविवार, 13 मार्च 2016

Najar

एक नजर के इन्तजार में, और नज़रें परेशान होती हैं,
एक नजर के जवाब में, दूसरी नज़र ग़ज़ल बन जाती हैं,
नजर-नजर के खेल में, यूँ जवानी बीती जाती हैं,
नयी दिशाओं में, नए आसमान की कहानी लिखी जाती हैं,
नजर से नजर तक, होती हैं हसीं गुफ्तगू
और एक दूजे को मिल जाता हैं मदमस्त नजराना
नजर-नजर के खेल में, फिर हो जाता हैं अंदाज शायराना
फिर न बंदिश जवानी की, न मंदिर, न मैखाना
इस दुनिया से दूसरी दुनिया में, हो जाते हैं रवाना
नजर-नजर के खेल में, फिर मौसम लगे मस्ताना ||

रविवार, 6 मार्च 2016

Na jane Kaun pukarta hain


न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||
बरसों की तनहाई, जाने किसका साज लेकर चली आती हैं ||


यूं तो याद नहीं हमें, गुजरे हुए वाकयात, और लम्हे
जाने कहाँ-कहाँ से ये जानी-पहचानी पुकार चली आती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||


मंजर और समंदर, दोनों ही बदलते रहते हैं अवस्थाएं
क्यों हर मोड मुड़कर, एक पहचानी सी डगर चली आती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||


ये हैं कौन, जो सदियों से पुकारे जाता हैं मुझ को बार-बार
और एक मेरी हस्ती हैं, इच्छाओं की भरमार में कैद हुई जाती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||


ये कौन हैं जो जगाये जाता हैं मुझ को, अनेको संकेतों से बार बार
और एक मेरी नींद हैं, की माया की रजाई में लपेट जाती हैं ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||


ये कौन हैं जो खींचता हैं दूर, प्रपंच के भूलभुलैया से कभी-कभार
और एक चिंता हैं भविष्य की, की भूलभुलैया में फंसा लेती हैं बरकरार ||
न जाने कौण पुकारता है मुझे, एक आवाज चली आती है ||

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

करती हूँ - Yes I do... :)


तन की शहनाई, मन की गहराई

अब में तुझको समर्पित करती हूँ

तेरी ही प्रतीक्षा में, तेरे मिलन तक

अब अपनी पात्रता अर्जित करती हूँ



दो शब्दों के बिच की तन्हाई

अब में तझको अर्पित करती हूँ

तेरे साथ जो हुई आँखमिचौनी

अब में उसको चर्चित करती हूँ



कहते होंगे तुझको आलसी

या फिर स्लो तेरे घरवाले

लेकिन, Thoughtful Work-In-Progress

आज में तुझको घोषित करती हूँ



कितना दूर तू, कितना पास तू

अनचली पगडंडी का प्रमाण तू

तेरे ही साथ के सपनो में

अब में पुण्य संचित करती हूँ



मन भावन तू, घना सावन तू

तुझ ही में सिमटने की

अब में गुजारिश करती हूँ


( Written earlier - sharing now )

गुरुवार, 12 नवंबर 2015

अंत (The End)


I wrote this today, in response to another blog by a blogger friend Nilesh Ranjan..Here is the link to his blog.

http://randomwithlife.com/2015/11/02

फिर कुछ उभरा होगा अपने ही अंत की राख से
फिर पत्तों की पांजेब बजी होगी, ठूंठ जैसे शाख से
फिर उमड़ा होगा सैलाब, रुके हुए किनारों से
फिर चल पड़ा होगा जीवन, नयी आशा की किरणों से ||

  

यही हैं जीवन, यही हैं मरण,  यही हैं यात्रा
आदि से अनंत तक, अनंत मरणों की जत्रा
फिर चलती हैं राहें जीवन की, रुकी हुई साँसे
फिर चलते हैं अर्जुन के साथ साथ, शकुनी के पांसे ||



यूँ ही चलेगा आवागमन का खेल
जब तक न हो जाए ओंकारसे ताल-मेल
फिर न होगा आना-जाना, न ही आदि-अंत
रुकेंगे स्वर्ग के द्वार पर – बुद्ध जैसे महंत ||


शनिवार, 7 नवंबर 2015

yahi hun main

Written in 2003
यहीं हूँ मैं, किसी प्यार का ख़याल हूँ
यहीं हूँ मैं, किसी मन का जंजाल हूँ

यहीं हूँ मैं,  एक तपती आग हूँ
यहीं हूँ मैं, एक होश का चिराग हूँ,

यहीं हूँ मैं, एकांत का विस्तार हूँ,
यहीं हूँ मैं, ‘अभी-यहाँ’ पर सवार हूँ,

यहीं हूँ मैं, एक अनंत तड़प हूँ,
यहीं हूँ मैं, एक निरंतर सड़क हूँ

यहीं हूँ मैं, एक असीम अँधेरा हूँ,
यहीं हूँ मैं, एक चिरंतन सवेरा हूँ

यहीं हूँ मैं, एक सनातन यात्रा हूँ
यहीं हूँ मैं, जीवनशाला की छात्रा हूँ

यहीं हूँ मैं, एक विशाल धरा का हिस्सा हूँ,
यहीं हूँ मैं, एक अनादि, अनंत किस्सा हूँ,

यहीं हूँ मैं, अभी भी यहीं हूँ मैं,
वही पुरानी बुद्दू सी, इस पार हूँ मैं

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

Sanyas mere osho ka

Dedicated to my sannyas-deeksha day - 29th October 1989

संन्यास मेरे ओशो का
मेरे सत्य की खोज है
'आ अब लौट चले ' कहनेवाले
मांझी की प्यारी नौका और मौज है
...

संन्यास मेरे ओशो का
मेरे समर्पण का आरंभ है
ओशो की ध्यान-वाणी में
भीगा यहाँ राव और रंक है

संन्यास मेरे ओशो का
मेरे सत्त्व और चित्त की शुद्धि है
तेजोमय होती जहा
चित्त की चेतना में वृद्धि है

संन्यास मेरे ओशो का
भूत और भविष्य से मुक्ति है
ध्यान करो और फल पाओ
पूरी  वैज्ञानिक यहाँ भक्ति है

संन्यास मेरे ओशो का
मेरे अस्तित्व का दर्पण है
हो जाता है यहाँ
अपने दर्प का तर्पण है

संन्यास मेरे ओशो का
एक अखंड, प्रचंड, प्रसन्न, संपन्न
व्यक्ति होने की यात्रा है
ध्यान की उर्जा और ZEN-STICK
यहाँ इस वैद्य की मात्रा  है

संन्यास मेरे ओशो का
अटूट प्रेमबंधन की शक्ति है
संन्यास मेरे ओशो का
परम सुन्दरता की अभिव्यक्ति है

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

Ai Ri Amrita


As an ardent fan of Amrita Pritam, I wrote this for her -  on 7-Sept-2014


ऐ री अमृता!!
तेरा अक्षरनामा  सज-धज के  आता हैं, किताबों से उठकर |
बरसता हैं आंखो से, तेरी सोहबत की बारिश बनकर|


ऐ री अमृता!!
क्या जानु मैं तू क्या लगती हैं मेरी, तेरे शब्दों मे खोकर| 
समय की दीवारें ढह जाती हैं, तुझको-मुझको जोडकर|


ऐ री अमृता!! मुझे निखार दे अपनी बेटी बनाकर|
बाहों मे सुलाकर, बरखा मे भिगोकर, खुशियों की पेटी बनाकर|

ऐ री अमृता!! 
जब जब तुझ से मिलती हूँ, पाठक/वाचक बनकर|
तू समा लेती हैं मुझको अपने आसमान मे, खुद का हिस्सा बनाकर|


ऐ री अमृता !
तेरे अल्फाज़ महज अल्फ़ाज़ नहीं, कायनात हैं |
दिलों को पिघलाकर  स्नेहसागर मे गिराना, ये तेरी ही करामात हैं|


ऐ री अमृता!!
तुम्हारे डॉक्टर देव के सजदे मे,  मैं ममता बन गयी|
हद तो तब हो गयी
रसीदी टिकिट पढ़ते पढ़ते, मैं अचानक अमृता अमृता हो गयी|
आंखो से तुम बहने लगी और मेरी अभिव्यक्ति खो गयी|


आंखो मे पानी बनकर ये नामा तुम्हारे लिए लिख रही हूँ|
पानी भी तुम, नामा भी तुम, तुमको ही प्रेम की अभिव्यक्ति बनाकर|

ऐ री अमृता!!
ऐ री अमृता!!

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

Mann mere to thahar jara

मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों के
ना दूर जा भविष्य मे, भावों के और अभावों के
अभी प्रहर बाकी हैं, कर्मो के प्रभावों के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों के

ना जा सुदूर भविष्य मे, बहारों के ख्वाबों के,
इस वर्तमान मे बो दे, बीज कल के स्वभावों के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों के

ना भागना फिर, अपने ही अस्तित्व की रातों से
ना ही जला लेना खुद को,  किसी की बदसूरत बातों से
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों के

न बन जीत का पूर्णविराम, न हो शिकार किसी के वारों के
ना ही मील का पत्थर बन, किसी के, ऊधार के गाँवों के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों के

ना जा गतकाल मे, जो भोग लिया वो भोग लिया
क्या अब भी असर बाकी हैं,  गुजरी हुई राहों के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों के

अब हटा दे इस पल मे, ज़ख़म पुराने, कांटो के  
और पी ले जाम अब, किसी की पाक निगाहों के
मन मेरे तू ठहर जरा, ना जाम छलका अपने भावों के

माँ प्रेम कैलाश
15 अक्तूबर 2015

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

Parvati

पार्वती की यात्रा, अभी पूरी कहाँ हुई?
होश के औषधि की मात्रा, अभी पूरी कहाँ हुई?

ना स्वपन दिखा, किसी शिव-शंकर के
उसके सहवास की पात्रता, अभी पूरी कहाँ हुई?

पहचान ना पाऊँगी उनको, न ही झेल पाऊँगी
मेरी मनीषाओं की, अभी भभूति कहाँ हुई?

ना जला अगन मे, न भटका अवगुण मे
मेरी बरसो पुरानी बेहोशी, अभी भंग कहाँ हुई?

तन के रोग अभी हटे नहीं, मन के रोग अभी छंटे नहीं
गुजरी इतनी राहें मगर, अभी मैं योगी कहाँ हुई?

अभी चालित हूँ, विचलित हूँ, यंत्र संचालित हूँ,
कहाँ प्रेम हैं, और कहाँ शिव, अभी मैं कैलाश कहाँ हुई?

पार्वती की यात्रा, अभी पूरी कहाँ हुई?
होश के औषधि की मात्रा, अभी पूरी कहाँ हुई?


माँ प्रेम कैलाश
13 अक्तूबर 2015

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

Parmatma ka anubhav - Tum

Dedicated to my beloved Master....


मेरा यार तुम, मेरा प्यार तुम
गुरुओ में चेतना का अंतिम शिखर तुम
ऊठती-गिरती वासनाओ का परिहार तुम
मुझ पत्थर पर प्रभावशाली प्रहार तुम

जब जब तुम में खो जाऊ
अस्तित्व की जीत तुम
जब जब तुम से अलग रहू
मेरे अहम से दूर तुम

तृष्णाओ की मधुशाला से
कर दो मुझे आजाद तुम
सब के बाद बची हुई,
फिर भी आखिरी मुराद तुम

मेरी तरलता की नियति तुम
मेरी चपलता की ज्योति तुम
अब समां लो असमय में
मैं तेरी प्रतीक्षा में गुम-सुम

मेरे प्राण तुम, मेरा रास तुम
मेरे ध्यान का मधुमास तुम
अपने हाथों में मेरा हाथ लिए
फिर फिर से रहो मेरे साथ तुम

मेरे प्यार का साज तुम
मेरी शुद्धता का ताज तुम
जल, थल, वायु, अगन से
सम्मानित मेरा आकाश तुम

मेरी वीणा का राग तुम,
मेरे ह्रदय का अनुराग तुम
संकोच को जलानेवाली आग तुम
परमात्मा का अनुभव तुम

मेरी प्यास तुम, मेरी आस तुम
मेरे जीवन का प्रयास तुम
मेरे पास तुम, मेरी सांस तुम
मेरे जीवन का प्रवास तुम

शनिवार, 22 अगस्त 2015

Paramatma ke khabari se mulakat



परमात्मा के खबरी से मुलाकात

Written on 2013_Oct_24


आज रात ९ बजे फिर एक बार
परमात्मा के खबरी से बाते होंगी
चन्द्रगुप्त की पोतडी खुलेगी
फिर कर्मो का लेखा-जोखा होगा
मेरे वचनों के विश्लेषण होंगे
मेरी सादगी के आभूषण होंगे
मेरे दर्द का न्याय होगा
फिर तो, कर्मो की ही बाराते निकलेंगी
दी हुई गालियों का जनाजा निकलेगा
पर मौत भी इसका इलाज नहीं होगी
आज रात ९ बजे फिर एक बार
परमात्मा के खबरी से बाते होंगी


ये क्या क्या ढोये जा रही हु मैं
अब तो वजन का बटवारा होगा
सारे मकान जो पीछे छोड़ आयी हु
उनका भी फिर एक बार से सामना होगा
फिर तो उनकी भी मरम्मत होगी
क्या पता अब भी शायद
किसी को मुझ से शिकायत होगी
आज रात ९ बजे फिर एक बार
परमात्मा के खबरी से बाते होंगी


पतली सी लड़की से मोटी सी औरत
जाने अपनी चमड़ी में क्या क्या छुपाये रखती है
फिर तो गुप्त धन का भी पर्दाफाश होगा
अब ना छिप सकेंगी दर्दभरी दास्ताने
अब ना छिप सकेंगे, पुराने गीत मस्ताने
फिर तो सभी की धीरे धीरे पदयात्रा होगी
आज रात ९ बजे फिर एक बार
परमात्मा के खबरी से बाते होंगी


पाये थे जो पत्थर, आज उनकी
निखालस मोतियों में तबदीली होगी
फिर तो दर्द की नदी ही बहेगी
बहते बहते खबरी के पीछे पीछे मुड लेगी
फिर गुजरेंगे सूरज से होकर
अपनी जख्मो को उसकी गर्मी से धोकर
फिर बहेंगी हवा की लहरे
पुराने जख्मो को अपने स्पर्श से बदल कर
फिर तो खबरी के साथ साथ चलकर
परमात्मा से मुलाकाते होगी
आज रात ९ बजे फिर एक बार
परमात्मा के खबरी से बाते होंगी

जाने कब उसकी मेहेर-नजर होगी
जाने कब आनंद की बौछार होगी
जाने कब फिर सावन आएगा
जाने कब हिसाब का पिटारा बंद होगा
लेकिन फिर भी
आज रात ९ बजे और एक बार
परमात्मा के खबरी से बाते होंगी